
॥ये मानवाः पापकृतस्तु सर्वदा सदा दुराचाररता वामार्गगाः। क्रोधाग्निदग्धाःकुटिलास्च कामिनाः सप्ताहयज्ञेन कलौ पुनन्ति ते॥

हमारे शास्त्रों में कहा गया है सनत कुमार जी सत्संग सुना रहे हैं भक्ति अपने पुत्रों के साथ आकर के विराजमान है लेकिन किसी को दिखाई नहीं दे रही है नारद जी कहते हैं सनतकुमारों से मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं पूछिए क्या बात है नारद जी ने संसार के मानव के कल्याण के लिए पूछा यदि कोई भक्त व्यक्ति भागवत सत्संग श्रवण करके मुक्ति पाया जाता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं यदि कोई ज्ञानी पुरुष भागवत श्रवण करके मोक्ष को प्राप्त करता है तो आश्चर्य नहीं है परंतु क्या किसी पापी व्यक्ति को सुनने से मुक्ति मिल सकती है यह प्रश्न जिसने जीवन में कभी भगवान का पूजन पाठ न किया हो सदा कुकर्म में रहा हो और मर करके प्रेत बन जाए तो क्या उसकी मुक्ति नहीं हो सकती है सनतकुमारों ने सुनकर के बहुत सुंदर व्याख्यान दिया है जिस मनुष्य ने जीवन में कभी कोई सत्कर्म नहीं किया दुराचार में पारायण जिसकी मनोवृत्तियां बनी रही क्रोध रूपी अग्नि से जो हमेशा जलता रहा ऐसा दुराचारी पापी व्यक्ति भी किसी के द्वारा सात दिन तक यदि भागवत सुन ले सत्संग सुन ले तो निश्चित रूप से उसके जीवन में परिवर्तन आ जाता है जिसका जीवन सत्यहीन है जो सत्य संभाषण नहीं करता जो माता-पिता की सेवा नहीं करता जो वर्णन शंकर पद्धति से उत्पन्न है बर्ण शंकर पद्धति मतलब है मां किसी बिरादरी की और पिता किसी दूसरी बिरादरी का ऐसी स्थिति में भी जो व्यक्ति उत्पन्न है पांच प्रकार के उग्र पापों में जिसकी प्रवृत्ति रही है वह भी 7 दिन तक भागवत सुन ले तो उसका मन पवित्र हो जाता है यहां एक बात और समझाना चाहता हूं किसने जीवन पर्यंत पाप कर्म किया और पाप कर्म करते-करते जिनकी मृत्यु हो गई और करने के बाद यदि भूत प्रेत पिसाच भी बन जाए उसके नाम से भी हम भागवत करवावें तो उसका जीवन पवित्र हो जाता है और वह मुक्त हो जाता है नारद जी ने कहा था महाराज यह बात हमारी समझ में नहीं आई जीवन पर्यंत पाप करने वाला व्यक्ति करने के बाद प्रेत बनने के पश्चात् भागवत सत्संग सुनकर के मोक्ष कैसे प्राप्त कर सकता है नारद जी के माध्यम से सनतकुमारों ने एक सुंदर प्रसंग कहा था उसे पसंद कथा का व्याख्यान हम आप तक पहुंचानाचाह रहे हैं नारद जी कहते हैं कैसे-कैसे भी प्रेत आत्मा ब्यक्ति भी भागवत को सुनकर के मोक्ष प्राप्त कर सकती है एक बात आपको और बता दूं हां सत्संग कीर्तन में जब भी आप बैठे तो भगवान नाम कीर्तन मन से जरूर करना चाहिए कीर्तन बोलना चाहिए जो कथा में कीर्तन गाते हैं उनके हृदय के पाप निकल जाते हैं तो वह पाप निकाल कर बाहर भाग जाते हैं कीर्तन भजन में मन लग जाए तो जीवन के समस्त पाप मिट जाते हैं और कहीं यदि ताली बजा करके कीर्तन किया जाए भजन किया जाए तो जो हाथ की अनिष्ट रेखाएं होती हैं वह भी अच्छे में प्ररणित हो जाती है कलयुग में केवल यही एक सारज् है एक जगह बैठकर के आधा घंटा 10 मिनट 20 मिनट जो भी समय मिलता है बैठकर के कीर्तन भजन करना चाहिए यही जीवन का सार है
शेष आगे भाग में
महाराज ओम जी वैदिक पंचशील काली मंदिर रुड़की





